Monday, 4 May 2020

International Nurses Day


अंतर्राष्ट्रीय    नर्सेस दिवस पर पैरामेडिकल स्टाफ को नमन


हम जानते हैं कि आज पूरा विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है। चारों और भय का आलम है। कोरोना नामक अदृश्य शत्रु पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले रहा है। हम सभी आज अपनी जान की रक्षा के लिए घर में दुबक कर बैठे हैं। हमें घर से बाहर निकलने में डर लग रहा है ऐसे में हमारे  कोरो ना योद्धा डॉक्टर ,नर्सेस पुलिसकर्मी, सफाई कर्मी अपनी जान को हथेली पर रखकर देश सेवा में जी-जान से जुटे हुए हैं पूरा मेडिकल स्टाफ अपनी जान की परवाह किए बगैर कोरोनावायरस से लोगों की जान बचाने में लगा हुआ है ।कोरोना  योद्धा हमारे लिए भगवान के समान है देवदूत हैं ।कोरोनावायरस से मरीजों को बचाने के लिए  मेडिकल स्टाफ अपने घर, परिवार और स्वास्थ्य की परवाह किए बगैर दिन-रात सेवा में लगा हुआ है ।विपरीत हालातों का सामना करके, पथराव झेल कर ,अभद्र व्यवहार सहन करके भी  यह लोग अपना कर्तव्य निभा रहे हैं ।अपने फर्ज से पीछे नहीं हट रहे हैं। हमारा यह फर्ज है कि हम इनका सम्मान करें, इनका सहयोग करें, इनके प्रति कृतज्ञ बने ।आज अंतर्राष्ट्रीय    नर्सेस दिवस पर पूरे देशवासियों की ओर से इन्हें शत-शत नमन।


फर्ज


बात उस समय की है जब कोरोनावायरस का कहर पूरे विश्व में फैल रहा था ।भारत भी इससे अछूता नहीं था दिनों दिन भारत में भी इसके केस बढ़ते जा रहे थे। सबसे ज्यादा खराब हालत इंदौर, मुंबई और दिल्ली की थी ।चंद्रेश एसआई की पोस्ट पर इंदौर में ही पदस्थ था ऐसे कठिन समय में वह लगातार अट्ठारह अट्ठारह घंटे की ड्यूटी कर रहा था ।लोगों की आवाजाही पर रोक लगाना, सोशल डिस्टेंस कायम रखना, पेट्रोलिंग करना यह सभी दायित्व का निर्वाह पुलिस प्रशासन कर रहा था ।सच पूछो तो भरपेट खाना भी नहीं खा पा    रहे थे यह लोग ।सुबह घर से लाया डिब्बा खाना खाते समय तक पूरा ठंडा हो जाता था ।बाहर का तो पानी पीने में भी डर लग रहा था कभी कभी तो प्यासे  ही बैठे रहते ऊपर से गर्मी कहर बरसा रही थी प्रचंड गर्मी को सहन कर यह लोग दिनभर ड्यूटी कर रहे थे ।दिनभर की ड्यूटी के बाद घर पहुंँचते ही चंद्रेश सबसे पहले घर से लगी बाहर की गली में नहाता फिर अंदर आता ।घर में भी उसने स्वयं को होम क्वॉरेंटाइन कर रखा था। अपनी प्यारी प्यारी  नन्ही सीदोनों बेटियों को भी गोद में    दुलार ने से भी उसे डर लगता था। उन्हीं भी दूर से ही दुलार भर लेता था ,बूढ़ी मां जो बिस्तर पर थी उनसे दूर से ही हाल-चाल पूछ लेता था। उसकी पत्नी साधना भी सरकारी अस्पताल में नर्स थी वह भी सुबह जल्दी जल्दी घर का पूरा काम करके बेटियों को दादी के पास छोड़कर ड्यूटी के लिए निकल जाती थी। जिसकी देर रात तक लौटती, कभी तो लगातार दो दो तीन तीन दिन तक अस्पताल में ही ड्यूटी देनी होती थी। दिनभर मरीजों के बीच में रहने से उसे भी संक्रमण का डर इस कदर बैठ गया था कि वह परिवार के सदस्यों से दूरी ही। बनाए रखती। कभी-कभी तो बच्चे सुबह का बना ठंडा खाना खाकर ही सो जाते, तो कभी भूखे।

इस तरह दोनों पति पत्नी समर्पित भाव से अपना फर्ज तथा बच्चों के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन कर   रहे थे। तभी अचानक चंद्रेश की तबीयत बिगड़ने लगी, उसे बहुत तेज बुखार और सिर दर्द होने लगा। साधना को कोरोना के लक्षण नजर रहे थे उसने तत्काल उसे अस्पताल में भर्ती कराया। जांच हुई, रिपोर्ट पॉजिटिव आई। चंद्रेश और साधना के होश उड़ गए ,पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस अस्पताल में साधना नर्स थी उसी अस्पताल में उसे र्ती

कराया गया ।साधना और उसके बच्चों की भी स्क्रीनिंग की गई। सब स्वस्थ  निकले सभी की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। साधना दिन रात पति की सेवा में जुट गई ।बच्चे दादी के पास पापा के स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना कर रहे थे। बार-बार दादी से पूछ रहे थे "पापा कब आएंगे ,मांँ और पापा के बिना हमें अच्छा नहीं लगता। दादी पापा अच्छे तो हो जाएंगे ना।" लगातार आठ दिन ट्रीटमेंट देने के बाद भी चंद्रेश की सांस उखड़ने लगी ।निमोनिया ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया। सुबह-सुबह उसने जीवन की अंतिम सांस ली। पति की मौत से साधना का हंँसता खेलता परिवार उजड़ गया। उस पर     असहनीय गाज गिरी। अंतिम संस्कार भी पुलिस प्रशासन द्वारा किया गया। साधना दूर से ही अंतिम दर्शन कर पाई, बेटियों ने मोबाइल पर पिता के अंतिम दर्शन किए ।पापा की लाडली बेटियों का रो रो कर बुरा हाल हो गया उनके असली हीरो उन्हें अकेला छोड़ गए ।पापा उनके लिए किसी हीरो से कम नहीं  थे उन्हें बार-बार पापा कि कहीं वह बात याद रही थी कि तुम दोनों को मैं आईपीएस बनाऊंँगा। तुम तो मेरी शान हो। पापा की हर बात रह रह कर याद रही थी। बूढ़ी मांँ  भी आखरी बार बेटे को देख नहीं पाई बार-बार रोते हुए एक ही बात कही जा रही थी "हे भगवान, मेरे छोरे की जगह मुझे उठा लेता इस बूढ़ी मांँ का सहारा छिन लिया तूने। तूने अच्छा नहीं किया रे भगवान ।इधर रो-रो कर साधना के आंखों के आंसू सूख गए ,कभी बेटियों को संभालती ,तो कभी सास को  हिम्मत   

 दिलाती ।सुहाग के साथ उसका तो संसार ही लुट गया। दुख की इस घड़ी में, कोई सिर पर हाथ रखने वाला भी नहीं था।  लॉक डाउन और सोशल डिस्टेंस ने दुख की इस घड़ी में आदमी को और अधिक अकेला कर दिया। ना कोई आंँसू          पोछने वाला, ना कोई हिम्मत दिलाने वाला और ना ही कोई साथ बैठने वाला था। अकेले ही दर्द को सहन करना है और अकेले ही इससे   उभरना  इस दुख की घड़ी में मायके और ससुराल से भी कोई नहीं सका।  जिनके साथ बैठकर रोने से उसका दिल हल्का हो जाता। साधना पूरी तरह अकेली पड़ गई यद्यपि पुलिस प्रशासन ने उसे आर्थिक सहायता भी दी साथ ही अन्य सहयोग भी किया  जैसे दवाई लाना, किराना भरना आदि। चंद्रेश के जाने से घर की रौनक चली गई  ।लॉक डाउन से जैसे शहर में सन्नाटा था ठीक  वैसे ही घर में भी सन्नाटा पसर गया ।सभी के मुंँह पर ताले लग गए। घर में चुप्पी बंध गई। पापा से दिन-रात फरमाइश  करने वाली  चंचल लड़कियांँ ,एकदम से समझदार बन गई।

 ना कोई फरमाइश और ना ही कोई    ज़िद्। इस दुख की घड़ी     ने दोनों को वक्त से पहले समझदार और मजबूत बना दिया। दोनों कभी दादी के पास बैठती ,तो कभी मां के आसूँ   पोछती ।समय जैसे पहाड़ बन गया ।बड़ी मुश्किल से बारह दिन निकले साधना ने खुद को संभाला और ड्यूटी ज्वाइन करने का निर्णय लिया, जैसे ही उसने अपनी नर्स की ड्रेस पहनी, बड़ी बेटी जो दस वर्ष की थी     रू आंसी होकर उसके सामने बैठ गई ।ँमांँ मत जाओ ना ,देखो पापा को तो हमने पहले ही खो दिया ,अब यदि आपको भी कुछ हो गया तो हमारा क्या होगा ?मांँ तुम्हें हमारी कसम  है ।आप मत जाओ मुझे डर लग रहा है ।दीदी की बातें सुनकर पाचँ वर्षीय पूजा भी मांँ के पैरों से चिपक कर खड़ी हो गई सास तुनक कर बोली "छोरियां सही के हैं ,दो चार महीने की छुट्टी ले ले ,कोरोना वो रोना खत्म हो जाए तब ड्यूटी जाजे।" अरे ,उसे अपने पति के आखिरी शब्द याद आने लगे कैसे जाते जाते उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में थाम कर बोला था "अपना और इन बच्चों का ध्यान रखना" उसकी आंँख भर आई दिलो-दिमाग में बेटी की बातें गूंँजने लगी सोचने लगी कि सच में को रोना के इस जंग में मुझे कुछ हो गया तो यह बच्चे अनाथ हो  जाएंगे ।दिल कमजोर पड़ गया तभी उसकी आंखों के सामने लाचार  हुए मरीजों के चेहरे घूमने लगे ,जिनके लिए वह भगवान के समान थी जो अपने प्राणों की रक्षा के लिए उस से आस लगाए बैठे थे ।उसने स्वयं को कमजोर होने से रोका ,दिल को मजबूत किया, खुद को याद दिलाया कि कैसे नौकरी ज्वाइन के समय हमें देश सेवा की शपथ दिलाई गई थी। आज देश को हमारी जरूरत है मुझे भावनाओं में बहकर अपना फर्ज नहीं भूलना चाहिए। अपने अंदर से आई इस आवाज ने उसे और अधिक मजबूत कर दिया। उसने फौरन बड़े प्यार से बेटी कोपैरों से अलग किया, बेटी के सिर पर हाथ रखा और उन्हें समझाया" देखो  ,जैसे तुम मेरे बच्चे हो वैसे ही मरीज भी मेरे बच्चों के समान है ।मुझे उनकी भी देखभाल और सेवा करनी है। तुम बिल्कुल डरो मत

 मुझे कुछ नहीं होगा ,भगवान हम सभी की रक्षा करेंगे। यह कहते हुए ,देश सेवा का जज्बा लिए ,वह निर्भीक होकर अपना फर्ज निभाने ,हॉस्पिटल की ओर निकल गई


फर्ज     -                          यह कहानी कोरोना योद्धा के अमिट योगदान पर आधारित है। इसमें एक दंपत्ति की कहानी है जिसमें पति पुलिस प्रशासन में कार्यरत है एवं पत्नी नर्स। पति की कोरोना से मृत्यु के उपरांत भी कैसे वह स्वयं को मजबूत कर अपनी नर्स के फर्ज को निभाती हैं।                                         श्रीमती कीर्ति दुबे 


 







 
 

1 comment:

  1. अपने कर्तव्य को जिम्मेदारी के साथ निभाने वाले लोग काबिलेतारीफ होते है ,अपने शपथ का पालन करने वाले भी ,ऐसे सच्चे सेवको को मेरा शत शत नमन

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